क्या है अविश्वास प्रस्ताव? मोदी सरकार पर क्या होगा इसका प्रभाव?

क्या है अविश्वास प्रस्ताव? मोदी सरकार पर क्या होगा इसका प्रभाव?

ज्ञातव्य हो कि सोमवार को संभवतः लोकसभा में वाई एस आर कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है जिसका समर्थन तीन दिन पहले तक एनडीए का हिस्सा रह चुकी तेलेगु देशम पार्टी करेगी और उसकी दलील है कि एनडीए सरकार ने आन्ध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया और जनभावना का सम्मान नहीं किया| अन्य भी कई पार्टियों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने का ऐलान किया है|

अविश्वास प्रस्ताव एक संसदीय व्यवस्था है जिसके अंतर्गत विपक्ष या अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार को गिराने के लिए, कमजोर करने के लिए या दबाव बनाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया जाता है| कभी-कभी यह विपक्ष द्वारा नहीं बल्कि सरकार का हिस्सा रहे खास सहयोगी द्वारा भी सरकार के विरुद्ध लाया जाता है| हालांकि ऐसे उदाहरण दुर्लभ है परन्तु गठबंधन में किसी मुद्दे पर असहमति या गठबंधन में टूट के पश्चात ही यह साधारणतः देखा जाता है| यह केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है| अविश्वास प्रस्ताव सदन में लाने के लिए न्यूनतम पचास सांसदों का समर्थन जरुरी है| अगर सरकार विश्वास मत हासिल करने में विफल होती है तो सरकार को त्याग पत्र देना होता है या संसद को भंग करना और आम चुनाव का अनुरोध करना होता है|

दुनिया में पहला अविश्वास प्रस्ताव मार्च 1782 में ब्रिटेन की संसद में पेश किया गया था| हालांकि अविश्वास प्रस्ताव को प्रचलित होने में समय लगा और 19वीं सदी के मध्य तक यह व्यवस्था सरकार गिराने का मजबूत विकल्प बन चूका था| भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के खिलाफ 1963 में जे. बी. कृपलानी द्वारा लाया गया था और उस समय कांग्रेस का कोई मजबूत विकल्प नहीं था| अतः यह प्रस्ताव महज एक औपचारिकता बन के रह गया और 347 वोट के साथ नेहरु सरकार बचाने में सफल रहे जबकि सरकार के विरुद्ध केवल 62 वोट पड़े|

 

 

वर्तमान परिदृश्य में देखा जाये तो मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ 2014 में सत्ता में आई जब यह मानसिकता बन चुकी थी कि कोई पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार नहीं बना सकती| अतः एक अभूतपूर्व एवं बीजेपी के रूप में कांग्रेस का मजबूत विकल्प भारतीय राजनीति को मिला एवं इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी के बाद मजबूत एवं लोकप्रिय प्रधानमंत्री| चार साल में 2महीने कम समय व्यतीत कर चुकी मोदी सरकार के खिलाफ NDA के ही सहयोगी रह चुकी TDP के एन. चंद्रबाबू नायडू अब YSR कांग्रेस द्वारा लायी जाने वाली अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में बयान दिया है|

 

 

बीजेपी का अविश्वास प्रस्ताव से रिश्ता पुराना है और अतीत में जाये तो सबसे रोचक घटना तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में लाया गया अवविश्वास प्रस्ताव याद आता है| 17 अप्रैल 1999, जब 13 महीने से चल रही वाजपेयी सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई तो मात्र 1 वोट से हार गयी और इस तरह सरकार गिर गयी| अनेक रोचक घटनाए इस हार में सामने आई| जब NDA सहयोगी जयललिता की पार्टी AIDMK गठबंधन से अलग हो गई| मायावती ने अविश्वास प्रस्ताव का हिस्सा न बनने का ऐलान करने के बावजूद वोटिंग करने पहुँची| और भी कितने राजनैतिक चहलकदमी हुई| एड़ी-छोटी की इस जंग में वाजपेयी सरकार 13 महीने में गिर गयी हालांकि अगले आम चुनाव में श्री वाजपेयी के नेतृत्व में पुनः NDA की सरकार बनी और पांच साल तक अपना कार्यकाल भी पूरी की परन्तु इस दौरान भी चार साल पूरा कर चुकी वाजपेयी सरकार के खिलाफ कांग्रेस 2003 में अविश्वास प्रस्ताव  लेकर आई, और यह प्रस्ताव भरी अंतर से गिर गया| तत्कालीन कांग्रेस प्रवक्ता एस. जयपाल रेड्डी का कथन था कि “अविश्वास प्रस्ताव सरकार गिराने के लिए नहीं लाया गया है| सरकार कि शक्ति परिक्षण के लिए नहीं है बल्कि चार साल के कार्यकाल के उपलब्धियों के पोल खोलने के लिए है|”

 

 

आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो बहुमत को लेकर NDA में संशय नहीं है यधपि कुछ सहयोगियों का टूटना एवं शिवसेना जैसे सहयोगी जो आंख दिखने से चुकते नहीं है एवं अवसर मिलते ही सरकार के खिलाफ मुखर रहे है, उनकी भी मतों को हटाकर मोदी सरकार विश्वास मत हासिल तो कर लेगी| अतः 2003 के तरह ही इस बार भी विपक्षी पार्टियों का उद्देश्य सरकार गिराना तो नहीं है परन्तु इसे पीछे का वह दुर्गामी एजेंडा है जो 2019 के लिए सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करना है|

सम्पूर्ण भारत में मोदी के खिलाफ जो माहौल तैयार हो रहा है उसका यह शुरुआत कहा जा सकता है| अतः यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के लिए यह प्रस्ताव तत्काल हानिकारक नहीं है, परन्तु सरकार के वजूद पर प्रश्न उठना, सरकार के कार्यकलापों पर प्रश्नचिंह 2019 में मोदी को आक्रमक चुनावी नीतियों को अमल कराना एवं जनता का विश्वास हासिल करना आसान नहीं होगा|

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