Kangana Ranaut plays role as Laxmibai

Superstar actress Kangana Ranaut who got the best actress award for the film Tanu Weds Manu Returns by The Honourable past president Mr Pranab Mukherjee. After ‘Simran’ movie Kangana Ranaut will be back in film ‘Manikarnika’ based on the history of Rani Laxmibai of Jhansi. The film Manikarnika will release in August 2018. This film is directed by Radha Krishna Jagarlamudi (KRISH). Manikarnika is the based on the revolt of 1857.
In 1856, Dalhousie introduced Grease Cartridges in India. On 29th March 1857, Mangal Pandey denied the use of Grease Cartridges and revolted to Barrackpore Chhawani (Bengal). On 8th April 1857, Mangal Pandey was hanged to death. He was the 34th native infantry soldier. After his death Revolt started from Meerut Cant on 10th may 1857.

Leaders of the revolt in movie Manikarnika:

‘Rani Laxmibai’ as ‘Kangana Ranaut’, ‘Jisshu Sengupta’ as ‘Gangadhar Rao’, ‘Atul Kulkarni’ as ‘Tantia Tope’, ‘Suresh Oberoi’ as ‘Bajirao the second’, ‘Sonu Sood’ as ‘Sadashiv’ and ‘Nihar Pandya’ as ‘Nana Saheb’ are in the film, the later is also famous in history by his name ‘Dhondu Pant’.
In this movie, Manikarnika is fighting with the English soldiers strongly until the end of her life. She never lost to the English in her lifetime. But the revolt of 1857 was a failure due to lack of skilful leadership, lack of arms and weapons and lack of transportation and communication. Nature of this revolt was Sepoy Mutiny.

After the revolt on November 1st, 1958 Queen’s proclamation was read at a grand darbar of Allahabad. The proclamation stated that the Queen has assumed the government of India and also the future policy of British Crown was declared.
There has been a tradition in Bollywood to show the history of real heroes’ chivalry and the ‘Manikarnika’ is the next after a grand success of the Bahubali and the Padmavat. Let’s the movie release, we will also come with the review and analysis to our readers.

Dale Steyn out of series

The South African pacer and in this world best pacer bowler Dale steyn out of series due to shoulder injury .
When the South African team playing side inded day two of the first test against Australia with 102-run lead their sojourn down in direction of earth and under was hit by massive below after that Dale steyn was ruled out of the remainder of series due to shoulder injury.
And after that the physiotherapy advised Dale steyn was taken to the hospital for preliminary and good dicision for treatment and scans .And the doctor say this is confirmed a new fractured of born join to shoulder point that sentence is said by South African’s team manager Mohammad moosjae.
After this happen Dale steyn will take no further part in this match and in this series and he will return a south africa to see a bone joint specialist doctor the who advised on appropriate plan of action then moosjae added injury of steyn this is so bad news for South African team because of this reason south Africa’s aspiration to seal their third succession test series win down under could be limbo.
Dale steyn one of the best pacer player of this world on that time ever he played cricket has 417 wickets in 85 tests and just four wickets shorts of over having Shaun Pollack’s record of highest wicket taker for the South Africa
in the longer format of the game he is a game changer player.Dale steyn was forced and pressure out of four test series against india after he sustained or injury during the first test last year.
The 33 years pacers Dale steyn is not a maintain a good health in previous 2-3years.

Mere Ache-Dinn

बचपन ही अच्छा था

पूरी स्कूल लाईफ सुबह-सुबह माँ ने ही उठाया था।
अब Alarm के भरोसे उठता हूँ।
आज भी चार बार Snooze दबाया है।
बिना नाश्ता किए माँ घर से निकलने ही नहीं देती थी। Canteen में कुछ खा लेने केलिए पैसे अलग से देती थी।
अब नाश्ता skip कर के सीधा लंच का नम्बर आता है। और देखो, अब कोई घर से निकलने से भी नहीं रोकता है।
Apartment के बैचलर्स ने एक बंदी को रखा है।
खाना वही बनाती है।
आज गोभी-पराठा बना था।
पराठा फिर से कच्चा था।
मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, वो बचपना ही अच्छा था।

उन दिनों
बस Class Tests की फिक्र होती थी
और Homeworks निपटाने की।
ना Meetings वाली दिक्कत थी।
ना Traffic jams का चक्कर था।
ना Politics सुलझाने की।
नींद भी चैन की आती थी।
और सपनों में खो जाता था। बिना बातों की बात पे हँस के कई लीटर खून बढ़ाता था।
अब Corporate-Smile देना पड़ता है।
तब का मुस्काना सच्चा था। मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, बचपना ही अच्छा था।
दोस्त भी तब के सच्चे थे।
जान भी हाजिर रखते थे।
Facebook भी नहीं हुआ करता था। बात-बात पे चिढ़ जाते थे।
पर मुँह पे गाली देते थे। Competition तो तब भी था।
बस Stress के लिए कोई जगह नहीं थी।
हर रोज हम लड़ लेते थें।
लेकिन लड़ने की कोई वजह नहीं होती थी।
अब दोस्ती भी है हिसाब की। किसने, किसके Profile पे कितने लाईक्स डाले।
बचपन ही अच्छा था।
माँ भी साथ में रहती थी, और सब कुछ अच्छा लगता था।
मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, बचपना ही अच्छा था।


Written by –

Ashutosh Kumar

How much lucky are you? How much luck does affect you?

New Delhi: I have always seen people finding themselves unlucky or blaming luck for their problem. It’s not a rare one, you too might have realized or heard people saying like this. Is this reality or how long it holds a fare notion? You would be happy to know that I also used to blame my “unlucky luck” for something when it was not completed according to my desire. Is the luck something which processes “our path of desire” or are we unlucky when we have something against our desire?

I will tell you to imagine whether we are always right in sphere of our desires and wishes. Obviously we could not be right at each and every time either by our wishes or by our deeds so what is there to worry if something is there against our wish. May be the God has saved us from a tragedy unknown to us. Be positive, hopeful and have faith on yourself, no power or bad luck can prevent you from what u deserve.

If being unlucky or luckless is your problem, I am putting here a solution for you. We always think luck is something we don’t have control over or we can’t get it through other sources as we do in other cases. Oh! It’s very annoying when having the talent we have to suffer due to luck.

I say that you can buy luck. Yes, you can but by your hard work only! There is no lucky person who has got it in free but obviously he/she has bought it paying hard work by. Blaming luck is like travelling in a bullet train going against our goal.

Not the luck but stamina is needed to win the race. When we loose we blame luck but again when we win the battle, who will we credit to? To the luck we hadn’t have a year ago or to the hard work we practised to defeat that had defeated us in earlier? Think it over and share your point of views.

क्या है अविश्वास प्रस्ताव? मोदी सरकार पर क्या होगा इसका प्रभाव?

ज्ञातव्य हो कि सोमवार को संभवतः लोकसभा में वाई एस आर कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है जिसका समर्थन तीन दिन पहले तक एनडीए का हिस्सा रह चुकी तेलेगु देशम पार्टी करेगी और उसकी दलील है कि एनडीए सरकार ने आन्ध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया और जनभावना का सम्मान नहीं किया| अन्य भी कई पार्टियों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने का ऐलान किया है|

अविश्वास प्रस्ताव एक संसदीय व्यवस्था है जिसके अंतर्गत विपक्ष या अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार को गिराने के लिए, कमजोर करने के लिए या दबाव बनाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया जाता है| कभी-कभी यह विपक्ष द्वारा नहीं बल्कि सरकार का हिस्सा रहे खास सहयोगी द्वारा भी सरकार के विरुद्ध लाया जाता है| हालांकि ऐसे उदाहरण दुर्लभ है परन्तु गठबंधन में किसी मुद्दे पर असहमति या गठबंधन में टूट के पश्चात ही यह साधारणतः देखा जाता है| यह केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है| अविश्वास प्रस्ताव सदन में लाने के लिए न्यूनतम पचास सांसदों का समर्थन जरुरी है| अगर सरकार विश्वास मत हासिल करने में विफल होती है तो सरकार को त्याग पत्र देना होता है या संसद को भंग करना और आम चुनाव का अनुरोध करना होता है|

दुनिया में पहला अविश्वास प्रस्ताव मार्च 1782 में ब्रिटेन की संसद में पेश किया गया था| हालांकि अविश्वास प्रस्ताव को प्रचलित होने में समय लगा और 19वीं सदी के मध्य तक यह व्यवस्था सरकार गिराने का मजबूत विकल्प बन चूका था| भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के खिलाफ 1963 में जे. बी. कृपलानी द्वारा लाया गया था और उस समय कांग्रेस का कोई मजबूत विकल्प नहीं था| अतः यह प्रस्ताव महज एक औपचारिकता बन के रह गया और 347 वोट के साथ नेहरु सरकार बचाने में सफल रहे जबकि सरकार के विरुद्ध केवल 62 वोट पड़े|



वर्तमान परिदृश्य में देखा जाये तो मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ 2014 में सत्ता में आई जब यह मानसिकता बन चुकी थी कि कोई पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार नहीं बना सकती| अतः एक अभूतपूर्व एवं बीजेपी के रूप में कांग्रेस का मजबूत विकल्प भारतीय राजनीति को मिला एवं इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी के बाद मजबूत एवं लोकप्रिय प्रधानमंत्री| चार साल में 2महीने कम समय व्यतीत कर चुकी मोदी सरकार के खिलाफ NDA के ही सहयोगी रह चुकी TDP के एन. चंद्रबाबू नायडू अब YSR कांग्रेस द्वारा लायी जाने वाली अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में बयान दिया है|



बीजेपी का अविश्वास प्रस्ताव से रिश्ता पुराना है और अतीत में जाये तो सबसे रोचक घटना तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में लाया गया अवविश्वास प्रस्ताव याद आता है| 17 अप्रैल 1999, जब 13 महीने से चल रही वाजपेयी सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई तो मात्र 1 वोट से हार गयी और इस तरह सरकार गिर गयी| अनेक रोचक घटनाए इस हार में सामने आई| जब NDA सहयोगी जयललिता की पार्टी AIDMK गठबंधन से अलग हो गई| मायावती ने अविश्वास प्रस्ताव का हिस्सा न बनने का ऐलान करने के बावजूद वोटिंग करने पहुँची| और भी कितने राजनैतिक चहलकदमी हुई| एड़ी-छोटी की इस जंग में वाजपेयी सरकार 13 महीने में गिर गयी हालांकि अगले आम चुनाव में श्री वाजपेयी के नेतृत्व में पुनः NDA की सरकार बनी और पांच साल तक अपना कार्यकाल भी पूरी की परन्तु इस दौरान भी चार साल पूरा कर चुकी वाजपेयी सरकार के खिलाफ कांग्रेस 2003 में अविश्वास प्रस्ताव  लेकर आई, और यह प्रस्ताव भरी अंतर से गिर गया| तत्कालीन कांग्रेस प्रवक्ता एस. जयपाल रेड्डी का कथन था कि “अविश्वास प्रस्ताव सरकार गिराने के लिए नहीं लाया गया है| सरकार कि शक्ति परिक्षण के लिए नहीं है बल्कि चार साल के कार्यकाल के उपलब्धियों के पोल खोलने के लिए है|”



आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो बहुमत को लेकर NDA में संशय नहीं है यधपि कुछ सहयोगियों का टूटना एवं शिवसेना जैसे सहयोगी जो आंख दिखने से चुकते नहीं है एवं अवसर मिलते ही सरकार के खिलाफ मुखर रहे है, उनकी भी मतों को हटाकर मोदी सरकार विश्वास मत हासिल तो कर लेगी| अतः 2003 के तरह ही इस बार भी विपक्षी पार्टियों का उद्देश्य सरकार गिराना तो नहीं है परन्तु इसे पीछे का वह दुर्गामी एजेंडा है जो 2019 के लिए सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करना है|

सम्पूर्ण भारत में मोदी के खिलाफ जो माहौल तैयार हो रहा है उसका यह शुरुआत कहा जा सकता है| अतः यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के लिए यह प्रस्ताव तत्काल हानिकारक नहीं है, परन्तु सरकार के वजूद पर प्रश्न उठना, सरकार के कार्यकलापों पर प्रश्नचिंह 2019 में मोदी को आक्रमक चुनावी नीतियों को अमल कराना एवं जनता का विश्वास हासिल करना आसान नहीं होगा|