फ़िर क्या है ” सच “;?

“सच क्या है?” क्या कोई जनता है ?

 

– नहीं, हम सच नहीं जानते।

 

क्यों?

– क्योकिं जिसने आ कर हमसे जो कहा हमने उसे ही सच मान लिया।

 

लेकिन, हमें कैसे पता कि वह जो कह रहा है वो बिल्कुल सच है ?

– क्योकिं उसे हमारे दिमाग ने सच मान लिया।

 

इसका मतलब है कि उसने हमसे जो कहा सब झूठ है ?

-नहीं। झूठ नहीं है।

 

झूठ भी नहीं है? और, सच भी नहीं ? तो फ़िर क्या है ?

– कुछ भी नहीं।

 

 

मतलब?

– मतलब इस दुनिया में ना तो कुछ “सच” है और ना ही कुछ “झूठ”।

 

 

तो फ़िर क्या है? कुछ तो होगा ?

– हाँ। है ना।

 

क्या?

– सच यह है कि इस दुनिया में सब कुछ “अस्थाई” है।

अस्थाई?

– हाँ। सब कुछ अस्थाई है।

 

कैसे?

“यह घड़ा (मटका) बना है मिट्टी का,

और एक दिन मिल जाएगा मिट्टी में। ”

 

फ़िर उसके बाद ?

– उसके बाद….

 

“मिट्टी विभाजित हो जाएँगे कण में,

और कण विभाजित हो जाएँगे स्थूल कण में। ”

 

फ़िर स्थूल कणों का क्या?

– अब सूर्य की किरणें इन स्थूल कणों को अवशोषित लेंगी।

 

 

लेखिका – अब क्या बचा?

– कुछ भी नहीं , सब गायब हो गया। सब कुछ ख़त्म हो गया।  मानो जैसे कभी कुछ था ही नहीं।

 

लेखिका- मतलब?

– मतलब, कुछ है ही नहीं इस दुनिया में।

 

मतलब ना तो कण बचे, ना मिट्टी और ना ही मटका (घड़ा)।

लेखिका इस सवांद के माध्यम से बस यह व्यक़्त करना चाहती है कि, इस संसार में सब कुछ नश्वर है।  सब कुछ अस्थाई है। फ़िर क्यों आपस में हम लड़तें रहतें हैं ?, फ़िर क्यों सच और झूठ के बीच में झूलते रहते रहते हैं ?, क्यों किसी को अपराधी और खुद को सही साबित करने में लगे रहतें हैं?

अर्थात! इस दुनिया में जब कुछ भी नहीं है तो क्यों किसी की गलतियाँ हमें दिखती है ? क्यों नहीं हम सबको माफ़ करते चलते बनते हैं ?

माफ़ कर दो। सबको माफ़ कर दो, क्योंकि यहाँ कुछ भी सच नहीं।

 

Written by- Tanuja Jha