Mere Ache-Dinn

Mere Ache-Dinn

बचपन ही अच्छा था

पूरी स्कूल लाईफ सुबह-सुबह माँ ने ही उठाया था।
अब Alarm के भरोसे उठता हूँ।
आज भी चार बार Snooze दबाया है।
बिना नाश्ता किए माँ घर से निकलने ही नहीं देती थी। Canteen में कुछ खा लेने केलिए पैसे अलग से देती थी।
अब नाश्ता skip कर के सीधा लंच का नम्बर आता है। और देखो, अब कोई घर से निकलने से भी नहीं रोकता है।
Apartment के बैचलर्स ने एक बंदी को रखा है।
खाना वही बनाती है।
आज गोभी-पराठा बना था।
पराठा फिर से कच्चा था।
मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, वो बचपना ही अच्छा था।

उन दिनों
बस Class Tests की फिक्र होती थी
और Homeworks निपटाने की।
ना Meetings वाली दिक्कत थी।
ना Traffic jams का चक्कर था।
ना Politics सुलझाने की।
नींद भी चैन की आती थी।
और सपनों में खो जाता था। बिना बातों की बात पे हँस के कई लीटर खून बढ़ाता था।
अब Corporate-Smile देना पड़ता है।
तब का मुस्काना सच्चा था। मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, बचपना ही अच्छा था।
दोस्त भी तब के सच्चे थे।
जान भी हाजिर रखते थे।
Facebook भी नहीं हुआ करता था। बात-बात पे चिढ़ जाते थे।
पर मुँह पे गाली देते थे। Competition तो तब भी था।
बस Stress के लिए कोई जगह नहीं थी।
हर रोज हम लड़ लेते थें।
लेकिन लड़ने की कोई वजह नहीं होती थी।
अब दोस्ती भी है हिसाब की। किसने, किसके Profile पे कितने लाईक्स डाले।
उफ्फफफफफफफफफफ,
बचपन ही अच्छा था।
माँ भी साथ में रहती थी, और सब कुछ अच्छा लगता था।
मैं खा-म-ख्वाह बड़ा हुआ यार, बचपना ही अच्छा था।

 

Written by –

Ashutosh Kumar

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